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بِسْمِ اللّهِ الرَّحْمـَنِ الرَّحِيم

ख़ुदा के लिए ! हज्ज और उम्रह को एक धार्मिक पिकनिक ना बनाइए
एक से ज़्यादा बार हज्ज और उम्राह करने वालों के नाम … एक खुला ख़त
  • मेरे प्यारे सादा लूह व्यापारियो जो बार बार पूरे परिवार के साथ (5 -Star ) हज्ज या उम्रह करने को बड़ी इबादत समझते हो
  • मेरे इज्ज़त वाले आलिमो, फाजिलो, मुर्शदो , जो नफिल को भी फ़र्ज़ बनाकर बार बार चले आते हो
  • खौम के चालाक अमीर लोग जो जमीनों पर नाजायेज़ ख्ब्जों से या दूसरी न1जयेज़ आमदनी से उम्रे पर उम्रे किए जाते हो
  • मेरे प्यारे पिताओ और माताओ, जो औलाद की मेहनत की कमाई पर इबादत का सवाब उठाते हो
  • मेरी खौम के सियासी नेताओ, जो बार बार सियासी उम्रे और हज्ज करके अपने वोटरों को अपनी मुसल्मानियत का सुबूत देते हो
  • सऊदी अरब में रहने वाले दोस्तो, जो बार बार हज्ज करके न सिर्फ खानून तोडते हो बल्कि दूसरों के लिए मुसीबत बन जाते हो

अस्सलामु अलैकुम वरह्मतुल्लाह वबर्कातुहु

पहले इस वाखिये को ध्यान  से पढ़ लो जो मौलाना अबुल हसन अली नदवी (رحمة الله عليه) ने नक़ल किया है.
बशीर बिन अब्दुल हारिस (رحمة الله عليه) एक बहुत बड़े बुजरुग थे. उनका एक चेला, एक बार उनके पास आया और कहा कि”या मौलाई, मैंने फिर एक बार हज्ज का इरादा किया है . इजाज़त दीजिए. ”
बुजरुग ने पुछा “निय्यत क्या है? अल्लाह की रज़ा या काबे और मदीने को देखना, या फिर अपने ज़हद और तकवे को बताना?”
चेले ने थोडा सोंचा फिर कहा कि ” हुज़ूर , अल्लाह कि रज़ा और क्या ?.”
बुजरुग ने कहा ” क्या मैं तुम्हें एक ऐसी बात कहूं जिस पर अमल करके हज्ज पर गए बिना ही एक  तो तुम्हारा हज्ज हो जाए, दुसरे अल्लाह ताला तुम्हारा हज्ज रज़ा भी करले, तीसरी बात यह कि तुम्हे हज्ज करने कि ख़ुशी और संतोष(Satisfaction) भी मिल जाए?” 
चेले  ने सहमत होकर कहा कि “हुजुर , ज़रूर बताय्ये”.
बुजरुग ने कहा कि “यदि तुम हज्ज पर होने वाले खर्चे के पैसे को गरीबों में बाँट दो जो औलाद के ज्यादा होने से , या उधार  या रोग या किसी और कारण से मोहताज हैं, या किसी ऐसे आदमी की मदद करो जो इतना गरीब है कि ज़कात भी नहीं दे सकता परन्तु अगर व कारोबार करे तो ज़कात देने के खाबिल बन सकता है, और उसके माध्यम से  दुसरे लोगों को रोजगार (Employment )  मिल सकता है तो इस अमल से न सिर्फ तुम्हारा नफील हज्ज भी खुबूल होगा बल्कि अल्लाह भी तुमसे  खुश हो जाएगा . अब कहो क्या चाहते हो? ”
चेला सोंच में पड  गया ,फिर कुछ समय बाद हिचकिचाते हूए बोला ” हुजुर , अब वास्तव में हज्ज का मूड बन चूका है. ” बुजरुग ने कहा :
” शैतान, इन्सान पर नेकीओं के बहाने से ही क़ाबू पाता है और उस से  वही आमाल करवाता है जो उसके नफस को पसंद हैं .”  

थोडा सा सोचिए , आज हिन्दुस्तान, और पकिस्तान ही में नहीं बल्कि  सारे संसार में एक तरफ मुसलमान अख्लाखी (Morally ), सियासी (Politically) और माशी (Financially)  ज़लील से ज़लील तर होता जा रहा है तो दूसरी तरफ मक्काह  और मदीना को दौड़ दौड़ कर आने वाले लाखों में बढ़ते जा रहे हैं. हरम_शरीफ में शब् क़दर  (27th Ramadan)  की दुआ में शरीक होने के लिए लाकों रूपए ख़र्च  करके आने  वालों की संख्या लाखों तक पहोंच चुकी है. फिर भी न कोई दुआ खुबूल होती है न किसी मुसलमान के अखलाख या चाल चलन में तब्दीली आती है. आखिर ऐसा क्यों है ?  
यह इसलिए है की आज हमारा हर अमल वह है जो हमारे नफस को पसंद हो . ऐसा कोई हुक्म जो अल्लाह और उसके रसूल (صلي الله عليه وسلم) ने दिया हो परन्तु वह हमारे मूड के खिलाफ हो , मिज़ाज और सिधांत से  मेल न खाता हो या उसे हमारी बुधि और मंतिक (Rationale  & Logic) न मानती हो, तो हम उस पर  हरगिज़ अमल नहीं करते . उसको सिर्फ टाल ही नहीं देते बल्कि  कोई न कोई बहाना अनातारात्मा(conscience ) के संतुष्ट  के लिए भी बना लेते हैं, बल्कि फतवे भी साथ लिए फिरते हैं.
पूछिए,किसी बेपर्दा औरत से , कहेगी “पर्दा आँखों और दिल में होना चाहिए.” 
पूछिए किसी समझदार मुसलमान से तब्लीघ के फ़र्ज़ होने के बारे में , कहेगा ” पहले आदमी को खुद अमल करना चाहिए उसके बाद दूसरों को दावत  देनी चहिए.”
पूछिए किसी भी दहेज़ के लिए बिक्ने वाले भिकारी, बेघैरत मर्द से, कहेगा “हम ने तो बिलकुल नहीं माँगा, लड़की वालों ने सब कुछ अपनी  ख़ुशी से दिया है.”
पूछिए सूद और रिश्वत के निजाम (System ) का साथ देने वाले से, कहेंगे “यह तो सिस्टम (System )  है हम किया करसकते  हैं”.
पूछिए झूट, घीबत, चुगली, बदगुमानी, हसद और फरेब करने वालों से , कहेंगे  “दिलों का हाल तो अल्लाह जानता है.  हम बुरी निय्यत से कोई काम नहीं करते”.
पूछिए रिश्तेदारियां  काटने वालों से कहेंगे “यदि दुसरे हमारे साथ अछा बर्ताव करते तो हम भी उनके साथ अछा बर्ताव करते. ”

हर आदमी यूँ  तो नमाज़ी और अमल करने वाला है,परन्तु हर एक ने अपनी पसंद की इबादत को पकड़ रखा है .  किसी को दाड़ी रखना पसंद है तो किसी को नमाज़ . किसी को नफिल उम्रे या हज्ज करना पसंद है तो किसी को जन्ता की सेवा के संस्था (Organization) खोलना पसंद है. परन्तु जब वह वख्त आता है कि जिस का हुक्म सब से पहले उनकी अपनी ज़ात पर नाफ़िज़(Impose) करना होता है तो सब पीछे हट जाते हैं और बहाने बनाने लगते हैं. जिस के बारे में हम ने ऊपर कहा है. इसकी तस्वीर सुरे हुजरात (आएत:14) में यूँ खिंची गई है.

قالت الأعراب آمنا قل لم تؤمنوا ولكن قولوا أسلمنا ولما يدخل الإيمان في قلوبكم
अनुवाद: यह बददु लोग कहते हैं हम ईमान लाए. इन से कह दीजिए तुम ईमान नहीं लाए तुम यह कहो कि इस्लाम लाए हो. ईमान तो तुम्हारे दिलों में अभी दाखिल भी नहीं हुआ.

इस्लाम लाए मतलब दुसरे लोग जो काम कर रहे हैं तुम भी कर रहे हो . दुसरे नमाज़ पढते हैं तुम भी पढते हो दुसरे रोज़ा जकात, निकाह, और खतना और तद्फीन (Burial ) वघैरा के इस्लामी   सिधान्तों पर चलते है.   तुम भी चलते हो ताकि मुस्लिम समाज में तुम्हारी गिन्ती हो. परन्तु ईमान लाना अलग चीज़ है जो अभी तुम्हारे दिलों में दाखिल भी नहीं हुआ. सिर्फ जबानों पर है. इसलिए जब असल में   तुम्हारी परीक्षा का समय    आता है तो तुम दूसरी इबादतों को सामने लाकर अपनी अंतरात्मा  (conscience)    को संतुष्ट करना चाहते हो जो  वास्तव में अल्लाह ताला को चकमा देना है. एक कमाने वाले से हलाल कमाई का सवाल पहले होगा बाद में नमाज़ों का. एक दुल्हे या दुल्हे के माता पिता से जोड़ा दहेज़ और घेर इस्लामी परम्पराओं का सवाल पहले होगा ,रोजों , ज़कात का बाद में. इसतरह एक पैसे रखने वाले से नफिल उम्रों और नफिल हज्ज का सवाल बाद में होगा पहले अल्लाह कि राह में खर्च करने का . लोग इस हदीस को तो याद रखते हैं कि एक हज्ज से दुसरे हज्ज और एक उम्रे से दुसरे उम्रे के बीच के तमाम छोटे गुनाह माफ़ कर दीए जाते हैं ,परन्तु इस हदीस को भूल जाते हैं कि पांच चीज़ों का जवाब दिए बिना खयामत के दिन कोई एक खदम भी आगे न जा सकेगा (चाहे उसने दूसरी इबादतों के पहाड़ ही क्यों न खड़ा  कर रखे हों) :
1 . समय   2 . जवानी कि सलाहियतें   3 . माल कहाँ से कमाया4 ,माल खर्च कहाँ और किस तरह हुआ?  5 . इल्म (हासिल करने और फैलाने  की कितनी कोशिश की ) .
किसलिए ऐसा होता है कि बार बार के उम्रे और हज्ज पर ट्रावेल्लिंग एजेंट को लाखों रूपए देते समय कोई दुख नहीं होता परन्तु एक ज़रूरतमंद सामने अजाए या खौम कि भलाई के लिए कोई अपील करदे तो बुरा लगता है. एक दो हज़ार  रूपए जेब से निकालते भी हैं तो दिल ख़राब होता है. इन्हें जब तक यह भरोसा न हो जाए कि मांगने वाला इन का बाद में बड़ा एहसान मानेगा दस रूपए भी नहीं देते. देते भी हैं तो ऐसे कि यदि वह पैसे का हिसाब न बताए तो दुबारा उसे आने नहीं देते और बदनाम करते हैं.
इसलिए ऐसा होता है कि हज्ज और उम्रह नफस को पसंद हैं .पसंद आने वाली इबादत में मज़ा भी आता है और जो पैसा या समय अपने लिए खर्च हो वह अछा लगता है . अल्लाह के लिए खर्च करने में माल कम होने का डर सताता है. इसलिए किसी कि मदद करने के सवाल पर वही कह देते हैं जो मुशरिकीन और मुनाफ़िखीन कहते थे.
ويسئلونك ماذا ينفقون
अनुवाद :”वह आप से पूछते हैं कि हम आखिर कितना खर्च करें ” (सूरः अल्बक्रह)
2.5% ज़कात खैरात तो हम करते ही हैं और क्या करें ?
आगे जवाब में कहा गया 
” قل العفو “
अनुवाद  ” उन से कह दीजिए सब अल्लाह कि राह  में खर्च   कर्दिजिए सिवाए इसके जो आज के खाने कि  या पहनने कि ज़रुरत का है.”
येही है ज़कात का और दान का सिद्धांत.

हजरत उमर (رضي الله عنه)  का कहना याद रहे कि
2.5% का हिसाब तो मुनाफिक करते है.”
इसका मतलब है कि मुनाफिक दिखाने के लिए नमाज़ पढते और ज़कात देते , रोजा भी रखते  ताके कोई उनपर ऊँगली  न उठाए . मोमिन के लिए 2.5% या 5%का सवाल ही किया. जब ज़रूरतमंद सामने अजाए या किसी खुद्दार ग़रीब का समाचार उसे मिलजाए तो वह अपने पास जो भी है वह अल्लाह की तरफ से उस आदमी की अमानत समझ कर तुरंत खर्च कर डालता है. 2.5% या 5% का सवाल ही नहीं करता. यह इंतज़ार भी नहीं करता कि कोई आए और उस से मांगे, और न यह इंतज़ार करता है कि उसके माल पर पूरा एक साल हुआ है या नहीं. वह खुद अपना फ़र्ज़ समझ कर अपने सम्बंध्यों में तलाश करता है कि कौन मोहताज है और कौन बीमार , कौन बेवाह है और कौन बच्चा पाधाई या रोज़गार से लगा हुआ नहीं है. कौनसा बाप अपनी बेटी के विवाह के लिए परेशान है . और कौन हजरत अली  (رضي الله عنه) कि सुन्नत पर रहते हुए बिना जोड़ा या दहेज़ के मर्दाना खुद्दारी के साथ नक़द महर अदा  करक विवाह करना चाहता है परन्तु  माल न होने से मजबूर है.   
हम लोग मुशरिक बुत परस्तों पर हंसते हैं कि एक गणेश या गनपथि जैसे तेहवार पर करोड़ों रूपए बेकार खर्च  कर देते हैं, और फिर लेजाकर उसे गंदे पानी  में खुद ही फ़ेंक आते हैं .
दीवाली में सिर्फ करोड़ों रूपए बेकार   खर्च ही नहीं करते बल्कि पटाखों में बहुत से जीवन भी नष्ट हो जाते हैं. परन्तु जब हम अपने दामन में झांकते हैं तो पता चलता है कि
हम भी उन्हीं कि तरह अपनी पसंद कि इबादतों पर करोड़ों खर्च कर रहे है. मिसाल के लिए किसी भी एक नगर जैसे हैदराबाद दखन या कराची पकिस्तान को देखें तो पता चलता है कि वहां से हर वर्ष कम से कम ऐसे दस हज़ार लोग नफिल उम्र या हज्ज करते हैं जिन का फ़र्ज़ उम्र  और  हज्ज अदा हो चूका है . उम्र  या हज्ज कि यात्रा पर कम से कम एक लाख रूपए का खर्च आता है. हालाँकि आज कल सारे  बड़े लीडर , व्यापारी, पहेलवान और मुर्शद  फर्स्ट क्लास या बिजनस क्लास में यात्रा करना और बड़ी होटलों में ठैरना अपनी शान समझते हैं. जिस पर एक आदमी का कम से कम खर्च दो लाख रूपए का आता है. परन्तु आप कम से कम हिसाब से भी अंदाजा लगाएँ तो :
10000 लोग x100000  रूपए = 1000000000 रूपए    
 
बाखी हिन्दुस्तान से मुंबई, लखनऊ, देहली. पटना, केराला ,बंगलूर, और मद्रास वघैरा से नफिल उम्रे और हज्ज करने वालों कि गिन्ती तो लाख से ऊँची जाती है परन्तु मिसाल के लिए यदि आप 
सिर्फ पचीस हज़ार लोग ही रखें तो हिसाब यह  बनता है:
100000  रूपए x 25000  लोग = 2500000000 रूपए = 625 M$   

पकिस्तान में भी सूरत इस से अलग नहीं. हर तीसरा पाकिस्तानी जो हज्ज या उम्रे पर आता है वह  उसका नफिल उम्र या हज्ज होता है. इसतरह पाकिस्तानी लोग भी चार से पाँच  अरब रूपए यानि कम से कम एक बिल्लियन  डालर हर वर्ष इस इबादत पर खर्च करते हैं जो फ़र्ज़ नहीं है. यह नहीं सोचा जाता की इस का फाएदा कौन उठा रहा है? फाएदा वह लोग उठा रहे हैं जिन की तिजोरियां  पहले से ही भरी पड़ी हैं. यानि एर ल्य्न्स , ट्रवेल एजंट्स , होटल के मालिकान, मौल्लिम वघैरा . अंदाज़ा कीजिए अगर यह पांच  छे  अरब रूपए अगर हर साल खौम की भलाई के लिए खर्च हों तो कुछ ही वर्षों में यह उम्मत उस मुखाम पर पहोंच जाएगी जहाँ लोग हाथ में ज़कात लिए मुसतहिक़ को धुंडते फिरते हैंगे पर वह नहीं मिल्ता  होगा .   
यह तो नामुमकिन है कि कोई आदमी या जमात उठे और पुरे पाँच छे अरब रूपए जमा करले. परन्तु यह तो मुमकिन है कि हर आदमी , हर वर्ष जो नफिल उम्रे या हज्ज कि निय्यत करता है वही  उसी निय्यत के साथ अपने खरीबी लोगों कि तालीम पर खर्च करदे. इसलिए कि जो बुधि अल्लाह ताला ने हिंदुस्तान और पकिस्तान के लोगों को दी है उसकी कोई मिसाल नहीं. अगर खौम के 50%लोग भी गरीबी कि सतह से उठ कर तालीम हासिल करलें तो अमेरिका और यूरप के देस भी इनसे हार जाएँ. हिन्दू खौम के लोग तालीम, साइंस, टेक्नोलोजी, कंप्यूटर, अकौन्ट्स और फ्य्नांस के मैदानों में हिंदुस्तान ,अमेरिका ही में नहीं युरप , खलीज और अफ्रीका में  भी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं. आप जिस आफिस के दरवाजे पर भी देखें वहां हिन्दू नाम कि तख्ती लगी होगी और अन्दर एक मुसलमान द्र्य्वर या क्लर्क बैठा होगा. यह देख कर क्या आप की घीरत नहीं जागती ? अमरीका, इस्राइल और संघ परिवार पर हम लानत तो करते हैं परन्तु उनसे अछी बातें क्यों नहीं सीखते . देखीए किस  तरह उनके अमीर लोग गरीब पढने वालों कि पूरी ज़िम्मेदारी लेते हैं और एक हम है कि उम्रे और हज्ज करने को तो इबादत समझते हैं , तालीम के नाम पर कुछ चंदा दे भी देते हैं परन्तु किसी विद्यार्थि कि पढ़ाई ख़तम होने तक पूरी ज़िम्मेदारी में हमें दूर दूर तक नेकी नज़र नहीं आती. जब कि मुसलमान विद्यार्थिओं को अगर अवसर मिले तो किसी को भी पीछे छोड़ सकते हैं.
यह भी तो मुमकिन है कि लोग अपना एक  नफिल  उम्रह या हज्ज कम करलें और मदरसों पर लगादें जहाँ वह उलमा और हुफ्फाज़ निकल रहें हैं जो इमाम और मौजज़न तो बनते हैं परन्तु आधुनिक शिक्षा के न होने के करण पीछे रह जाते हैं.  यदि हम इन मदरसों को आधुनिक शिक्षा से सजा दें तो सोंचिए कितनी बड़ी  सेवा हो सकती है. मदरसों को बजाये ज़कात , खैरात देने के और उलमा के आत्मसम्मान को ठेस पहोंचाने के अगर दो दो , चार चार लोग मिलकर पूरा मदरसा ही स्पोंसर करलें तो  मदरसों को न सिर्फ साओ , साओ  . पचास, पचास के चंदों को वसूल कने के अज़ाब से छुटकारा मिल जाए बल्कि दीनी तालीम हासिल करने वालों की इज्ज़त भी बढे गी. आज हर दीनी या समाजी जमात के पास कागज़ पर ऐसा शानदार मंसूबा है जो खौम के किसी न किसी विभाग को मज़बूत कर सकता है. परन्तु माल और लोग न होने के करण वह किसी भी मंसूबे पर अमल नहीं कर सकते. और अमीर लोग यह चाहते हैं कि खुद तो कमाते रहें, अपनी मर्जी से खर्च भी करते रहें, और फिर ज्यादा बचत हो तो नफिल उम्रे और हज्ज भी करते रहें और अपने नफस को मोटा करते रहें,परन्तु जो लोग दीनी जमातों या संस्थाओं, में काम कर रहे हैं, वह नौकरियां या कारोबार छोड़ दें. बीवी बच्चों को अल्लाह के नाम पर छोड़ दें और बस अल्लाह के लिए जमात का काम करते रहें, आप का बच्चा तो बहुत ही अच्छे स्कूल में पढ़े, अमरीका, लन्दन जाए परन्तु मदरसे या जमात वालों के बच्चे सरकारी स्कूल या मुफ्त मदरसे में पढ़े. क्या यह  खुदगर्जी नहीं? अपनी पसंद कि इबादत के लिए तो आप लाखों रूपए फूँक सकते हैं परन्तु  पूरी खौम के विकास के लिए जमातों और संस्थाओं के मंसूबों पर येही रखम नहीं लगा सकते. क्या यह मुमकिन नहीं कि आप एक नफिल उम्र या हज्ज का पैसा जो भी अपनी पसंद कि जमात हो उसके लोगों और मंसूबों पर खर्च करदें ताकि वह जिस मख्सद से उठी है वह  कोई  बड़ा काम करसकें. अगर साओ लोग भी ऐसा कर लेते हैं तो आज बहुत सी जमातें और संस्थाएं ऐसी हैं जो दुबारा ताखतवर  होकर ख्यादत  कर सकती हैं. मरहूम डिप्टी नजीर अहमद के शब्द याद रहें कि : 
“मेरे प्यारो, तुम ज़ाती तौर पर (Individually) चाहे लाख तरखी करलो, चाहे जितने अमीर और बलवान हो जाओ, परन्तु अगर तुम्हारी इज्तेमाई ताखातें कमज़ोर पड़  जाएँ तो तुम्हारी ज़ाती हैस्यत तुम को इज्तेमाई तौर  पर ज़लील होने से नहीं रोक सकती .” (इब्नुल्वक्त)
बोम्बाई के मुसल्मानों कि  मिसाल याद रखो कि वहां हजारों अमीर हैं, जो हर साल उम्र और हज्ज पाबन्दी से करते हैं हैद्रबदियों  या पकिस्तनिओन से कहीं ज्यादा ज़कात और खैरात निकलते हैं परन्तु उनकी इज्तेमाई ताखातें यानि जमातें , और संस्थाएं माल कि कमी , आपस की लड़ाई, और मस्लाकी झगड़ों के कारण  इतनी कमज़ोर हैं कि जिस समय बाबरी मस्जिद के बाद बडे फसादात फूट पडे तो प्रधान मंत्री नरसिम्हा राव तुरंत बोम्बाई पहुंचा. शिवसेना के जितने लोग  प्रभावित हुए थे उनसे मिलने गया परन्तु न किसी मुसलमान लीडर से मिला न किसी   मुसलमान का  मिज़ाज पुछा. लोगों ने पुछा कि आप मुसलमानों से क्यों नहीं मिले तो जवाब दिया कि “किस से मिल्ता ?” येही गुजरात में हुआ. सोनिया गाँधी ने यह जान्ते हुए भी कि मुसलमान बदतरीन फसादात से  पीडित  हुए हैं किसी मुसलमान से मिल्ना गवारा न किया. कारण  साफ़ है. वह यह है कि मुसलमान ज़ाती तरखी की इच्छा तो रखते हैं परन्तु इज्तेमाई तौर पर  बलवान होने की ज़रुरत को वह नहीं समझते  . इसलिए न वह किसी जमात में शरीक होता है न किसी जमात के हाथ मजबूत करने का उनके पास कोई मंसूबा है. जिस खौम को इज्तेमाइअत की ज़रुरत को जानना न आता हो, जिस में जमातें बलवान न हों , इस खौम को गुजरात, हाशिमपुरा, भीवंदी, माओ, मेरठ, जमशेदपुर, वघैरा की तरह नष्ट कर डालना दुश्मन के लिए आसान हो जाता है.येही नहीं बल्कि उस खौम की ज़बान, कल्चर, और साहित्य को खतम करना भी बहुत आसान होजाता है..  
यही हाल पकिस्तान का है जहाँ की लिट्रेसी रेट (Literacy Rate )  12% है. और गरीबी की दर 75% है.यह समय है कि हर व्यापारी, हर आलिम, हर मुर्शद, हर अमीर आदमी और हर असर रखने वाला मुलाजिम किसी न किसी जमात या मदरसे या संस्था से जुड़ जाए और उसको मजबूत करे. जिसतरह से मुना से हजारों खाफिले अलग अलाग निकलते हैं परन्तु पहोंचते एक ही जगह हैं यानि अरफात में. इसी तरह सैकड़ों  जमातें, या संस्थाएं हैं, अलग अलग उद्देश्य और काम करने का तरीका अलग है, परन्तु तमाम यदि अपने लक्ष्य में कामयाब हो जाएँ तो यह  उम्मत जिस जगह पहोंचे गी वह है नवजागरण यानि निशात सानिया यानि (Renaissance ).

क्या  यह  मुमकिन  नहीं कि आप  अपने नफिल उम्रे कि कमाई इन बहुत से उर्दू अखबारों और पत्रिकाओं पर लगा दें   जो इस जबान को जिंदा रखने की कोशिश में लगे हुए हैं? या उन उर्दू स्कूलों को खायम रखने पर लगा दें जो सिर्फ उर्दू जबान ही के लिए नहीं बल्कि उर्दू जबान से जुड़े एक पुरे दीन, कल्चर, सभ्यता और इतिहास को बचाने की जंग लड़ रहे हैं.
क्या आप जानते हैं कि आप के नगरों के  बाहर के जिलों में हज़ारों यतीम , घेर खौम के दुसरे यतीमखानों में पल रहे हैं और दुसरे धरम में जा रहे हैं. क्या एक एक आदमी गाँव में यतीमखाने की पूरी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता ? क्या आप ने वह हदीस नहीं सुनी के किसी यतीम कि परवरिश करने वाला खयामत में मेरे साथ इस तरह खरीब होगा जैसे दो जुडी हवी उँगलियाँ होती हैं ?
आप पूरी इंसानियत कि भलाई के लिए पैदा हुए थे परन्तु आह आप का समय , आप का चंदा और आप कि पूरी ताखत सिर्फ मुसलमानों के लिए है. इसलिए दूसरी खौमें आप को इंसानियत का हमदर्द नहीं समझतीं. क्या आप इंसानियत के लिए यह नहीं कर सकते कि कोई आदमी जुजाम संटर (Leprosy centre ) खोल ले. कोई टी बी  ( T . B) या एड्स (Aids) के लिए अपना पैसा दे और आप भी दूसरी खौमों को लाभ पहोंचएं? क्या दूसरी खौमों की संस्थाओं से मुसलमान लाभ नहीं उठाते ?
हजारों लड़कियां  जोड़े दहेज़ की मजबूरी के कारण दुसरे  धरमों  के लोगों से शादियाँ कर रही हैं या इनके पास नौकरियां कर रही है, या जिसम बेचने पर मजबूर है. हजारों ऐसी हैं जो बेसहारा हैं जिन्हें उनके पति छोड़ कर भाग गए हैं या नाकारा हैं. इनके हजारों बच्चे तालीम नहीं पा रहे हैं और चोर उचक्के बन रहें हैं. क्या आप को अंग्रेजी और दुसरे समाचार पत्र पड़ते हुए यह नहीं सुझाई देता की कहीं किसी खबर में किसी मुसलमान का नाम नहीं आता? यदि आता है तो सिर्फ जुर्म और दुर्घटना के सफहों पर. क्या आप का आत्मसम्मान नहीं जागता? क्या आप अपने नफिल उम्रे और हज्ज की रख्मों से ऐसे संटर नहीं खोल सकते जहाँ ऐसी बेसहारा औरतों को और उनके बच्चों को सहारा दिया जा सके? कौन नहीं जनता कि जोड़ा या दहेज़ या स्त्री धन    चाहे ख़ुशी से दिया जाए या मांगने पर दोनों तरह हराम है.  विवाह के दिन का खाना जिसका खर्च लड़की वालों पर डाल दिया जाता है यह सब हराम है. परन्तु लोग जानते बुझते अपने लाभ के लिए इन चीज़ों को जाएज़ कर लेते हैं. एक उम्रे कि रखम में कम से कम पांच हज़ार संख्या  तक एक किताब प्रकाशित (publish ) हो सकी है . जिस के द्वारा इन हराम कामों   के बारे में  लोगों को बता कर उनकी राए को ठीक किया जा सकता है.
क्या आप अपने नफिल उम्रों और हज्ज के पैसे   को इन योग्य विद्यार्थियों के लिए नहीं दे सकते जिन  में बहुत अच्छी तखरीर करने और लिखने कि सलiहियतें हैं  जो घेर मुस्लिमों में जाकर सेमीनार (Seminar ) या गुफ्तगू (dialogue ) या debate के द्वारा इस्लाम के बारे में जो गलत फहमियां (Misunderstandings ) उनके ज़हनों में ठोंस दी गई हैं उनको दूर कर सकते हैं.? यही तो हिन्दू लोग कर रहे हैं, और यही तो अमरीका और इसराईल करते हैं यानि अछे Speaker  और Writer  पैदा करने पर लाखों रूपए खर्च करते हैं.
क्या आप इन किताबों   को हिंदी , अंग्रेजी, तेलगु, मराठी वघैरा  में तरजुमे (Translation ) करवाकर जिंदा नहीं कर सकते जो हजारों कि संख्या  में आज उर्दू में होने के कारण ख़तम हो रही हैं.और उनके साथ ही आप के दीन का और इतहास और साहित्य का एक बड़ा सरमाया ख़तम ही नहीं बल्कि नष्ट हो रहा है? सिर्फ आप के एक नफिल उम्रे या हज्ज कि खीमत में कम से कम दो किताबें प्रकाशित हो सकती हैं. जो जब तक पढ़ी जाती रहेंगी आप के लिए नेकियाँ लिखी जाती रहेंगी.
आज हर शहर बड़े से बड़ा होता जा रहा है और मुसलमान भी एक से एक आला शानदार घर बना रहें हैं. परन्तु दूर दूर तक कोई मस्जीद नहीं  मिलती. कई गाँव ऐसे हैं जहाँ कोई मस्जिद नहीं है. बेहिस होने कि इन्तहा यह है कि खुद मुसलमान ऐसे कई प्लाटिंग (Plotting ) के व्यापार में मिले हुए हैं जिस में कमर्शिअल (Commercial ) प्लाट सवों हैं परन्तु पूरी कालोनी में कोई मस्जीद नहीं होती, यदि होती भी है तो मुश्किल से सओ अदमिओं के लिए भी काफी नहीं होती. क्या आप दो चार लोग मिल कर अपने उम्रों और हज्ज की रख्मों से नई नई बस्तिओं में मस्जिद नहीं बना सकते ?
कितने ऐसे बेगुनाह मासूम जवान हैं जिनको दहशत गर्दी के जुर्म में महीनों बल्कि वर्षों से जेलों में बंद कर दिया गया है, जो अपने परिवारों के अकेले कमाने वाले हैं. उनको आज़ाद कर वाना खुरान के शब्दों में “गर्दनों को छुडाना  ” है. एक एक नफिल उम्रे या हज्ज कि रखम से एक एक परिवार मुसीबत से छुटकारा पा सकता है.
 
यदि आप इन कामों में से कोई काम को भी जरूरी नहीं समझते तो कोई बात नहीं परन्तु उस काम को तो शुरू कर सकते  हैं जो आप के लिए मुख्य हो और जिस से खौम का लाभ हो सकता है. इस तरह किसी की मर्ज़ी दीनी, तालीमी या साहित्य के मैदान में हो सकती है या और किसी मैदान में काम करने कि इच्छा हो सकती है. इस तरह हिन्दुस्तान और पकिस्तान से हर साल हजारों नफिल उम्र और हज्ज पर जाने वालों का अगर एक एक लाख रूपया अलग अलग इज्तेमाई कामों कि तरखी पर लगना शुरू हो जाए  तो इन्शाल्लाह आने  वाले दस पंद्रह   वर्षों में  उम्मत का   अख्लाखी , आर्थिक ,दीनी   और राजनेतिक नाख्शा बदल जाएगा.

अब आईये , सऊदी अरब में रहने वाले उन हाजिओं पर बात हो जाए जो सऊदी अरब के अलग अलग मुखामात  से हर दो चार साल बाद मोअल्लिमीन को कम से कम दो हजार रियाल दे कर चले आते हैं . जहाँ  तक साल के दुसरे महीनों में उम्रे करने का सवाल है उसमे कोई बात नहीं. परन्तु जब पैसा खर्च करके हज्ज पर आकर दुसरे हाजिओं के लिए मुसीबत खड़ी करने का सवाल है उनपर वही अख्लाकी जिम्मेदारी है जो हिंदुस्तान और पकिस्तान से नफिल उम्र और हज्ज पर आने वालों पर है , कि वह दूसरों के लिए रूकावट न बनें.
सऊदी सरकार हज्ज के शानदार इन्तेज़ामात करने के लिए अपनी मिसाल आप है. इसके बावजूद  बहुत से लोगों के अiजाने के कारण हर वर्ष बहुत सी जानें दुर्घटनाओं कि नज़र हो जाती हैं. इतने सारे लाखों हाजिओं का इंतज़ाम  करना कोई मामूली कारनामा नहीं. परन्तु अगर लोग मदद न करें तो दुर्घटनाएं ही नहीं बल्कि रहने  , बल्दिया, ट्राफिक वघीरा की समस्याओं को खाबू  में नहीं किया जा सकता. सऊदी सरकार हर वर्ष यह  कोशिश  करती है कि पहली बार उम्र या हज्ज करने वालों को पहले मौखा मिले. परन्तु नफिल हज्ज और उम्रे वाले दूसरों के लिए कष्ट का कारण बन जाते हैं . और इतनी भीड़ कर देते हैं कि खुद को और दूसरों को भी इबादत  का  सही मजा नहीं लेने देते. हैरत और अफ़सोस तो उन अखामा होल्डर हाजिओं पर है जो सऊदी खानून को जानते  हैं परन्तु खानून तोडने को आदत बना रखा है. क्या ऐसे हाजी और उनकी मदद करने वाले मुआल्लिमीन जो उन्हें बिना तसरीह के हज्ज करने में मदद करते हैं अल्लाह ताला  के पास खयामत में खानून तोडने वाले नहीं हैं? हमें कई ऐसे खुद बने हुए मुफ़्ती और आलिम मिले जो हज्ज करने के लिए मुल्की खानून को तोडना जाएज़ समझते हैं. हालाँकि यह ज़रूर नज़र में रखना चाहिए कि सऊदी उलमा कभी कोई शरीअत के खिलाफ खानून जारी नहीं होने देते .लोगों को चाहिए के खानून कि इज्जत करें.
 याद राखिए, यदि नफिल हज्ज और   उम्रों को  एक से  ज़्यादा मर्तबा करने का अमल  रसूल अल्लाह (صلي الله عليه وسلم) को पसंद होता तो रसूल (صلي الله عليه وسلم) की सीरत औए सहाबा  (رضي الله عنه) की सीरत उनकी चर्चा से भरी होती .

रसूल अल्लाह (صلي الله عليه وسلم) ने कई ऐसे आमाल के बारे में करने को कहा जिनका करना नफिल हज्ज या उम्रे ही के बराबर है. जैसे किसी घुलाम को छुड़ाना , किसी मुसीबत में रहने  वाले को इस से बाहर निकालना वघैरा. एक बार ऐसा भी हुआ कि जब एक साहबी ने बहुत बार पूछना शुरू किया कि क्या हर साल हज्ज फ़र्ज़ किया गया है तो आप (صلي الله عليه وسلم) ने गुस्से से कहा कि “नहीं”.

मेरे मोहतरम दोस्तों, हज्ज या उम्र एर पोर्ट से एर पोर्ट का सफ़र नहीं. इसका सफ़र इब्राहिमी इरादे का सफ़र है. इसकी शुरुआत रिश्तेदारों की खाने की दावत और गुलपोशियों से   नहीं   होता और न इसका खात्मा गुल्पोशिओं और  मुबाराक्बiदियों पर होता है. हज्ज या उम्र हजरत इब्राहीम के उस सफ़र का नाम है जो खुम (इराक) से शुरू होकर मक्के पर ख़तम होता है.

जो इस सफ़र के लिए तैयार हो उसकी पहली मंजिल घर से शुरू होती है और बाप की उस नाजयेज़ कमाई के खिलाफ होती है जो कि उस समय इज्ज़त वाली और जाएज़ आमदनी समझी जाती थी. घर से निकाल दिया जाना हज्ज के सफ़र का शुरू होना है. दूसरी मंजिल में बुतों को तोडना है. सिर्फ पत्थर के बुत ही नहीं बल्कि इस से मिले हुए डर के बुत, खानून के बुत,   बीवी बच्चों के भविष्य के बुत, माता पिता की जान माल और इज्ज़त के बुत और खुद अपनी जान माल के बुत, इन तमाम बुतों को तोडने के लिए सब से पहले शिर्क के बुत को तोड़ कर वह्दानिअत के एलान के साथ ही हज्ज का असल सफ़र शुरू हो जाता है. इसके साथ ही समय का खानून आप के लिए मौत की सजा लिखता है. माता पिता रिश्ता तोड़  लेते हैं दोस्त और रिश्तेदार दुश्मन बन जाते हैं. घर के पास किसी मंदिर में घुस कर किसी बुत को तोड़ देना या घर से बुतपरस्ती की मुश्रीकाना और बिदत पर खयाम निशानिओं और परम्पराओं को ख़तम करना आसान है परन्तु ऊपर कहे गए बुतों को तोडना मुश्किल है जो हमारे मिजाज में मिल चुके हैं. जिन बुतों के कारण समाज में हमारी इज्जत है . इन्हीं के कारण हमारी बेटियों और बेटों के अच्छे घरानों से रिश्ते आते हैं. इन बुतों को तोड़े  बिना अगर कोई यह चाहे कि हजरत इब्राहीम कि खिलाफत और इमामत हासिल करले तो यह नामुमकिन   है. परन्तु जिसके लिए मुमकिन हो जाए उसके लिए नमरूद कि आग भी बाग़ बन जाती है. अखल तमाशा देख कर अशचार्ये में रह जाती है और इश्क नतीजे के डर से आज़ाद होकर आग में कूद पड़ता है. यह असल में हज्ज के सफ़र का (immigration ) है. इस  सफ़र के  लिए माता पिता के पास से ही नहीं बल्कि घर और वतन से भी निकाल दिया जाना ज़रूरी होता है तब जाकर मक्के कि तरफ  जाना शुरू होता है. मक्काह पहोंचने पर हज्ज का तुरंत खात्मा नहीं होता. बल्कि पहले सारे संसार कि इमामत दी जाती है. परन्तु इस से पहले एक आखरी परीक्षा और होती है जो सऊदी के वीजा कि तरह अहेम है. यदि बिना वीजा के कोई अहराम बांध कर पहूँच जाए तो उसका जो नतीजा निकलता है वही अंजाम मानवी तौर पर उस हज्ज या उम्रे का भी होता है जो बिना इस आखरी शर्त के हज्ज और उम्रे को मुकम्मिल समझता है. घर, माता पिता, महल्ला, और वतन छोड़ना कोई मुश्किल काम नहीं . जाहेल बीवियों के कारण लोग
माता पिता को यूँ भी छोड़ते हैं . रोज़गार (Employment ) के लिए वतन को भी छोड़ते हैं. परन्तु कोई अपनी औलाद को नहीं छोड़ सकता. इसके लिए तो आदमी हराम और हलाल के बारे में भी नहीं सोंचता. परन्तु हज्ज या उम्र जो के हजरत इब्राहीम ने अदा किया वह औलाद कि खुरबानी के बिना पूरा ही नहीं होता . इसका अलामती सुबूत यह है कि जब खुरबानी के जानवर पर आदमी छूरी फेरता है तो दिल में ठोस यह इरादा कर लेता है कि यदि अल्लाह के हुक्म के आगे औलाद भी आजाए तो उसे ऐसे ही खुर्बान कर दूंगा.  बदकिसमती  से आज के समय में लाखों बकरे, गएँ , और ऊँट खुर्बान तो हो रहे हैं , गोश्त भी बांटा जा रहा है, फिकाही मसले जैसे जानवर कैसा हो, उसकी उम्र क्या हो, खुर्बान करते  समय उसका मोंह किधर हो, क्या दुआ पढ़ी जाए वघैरा खूब बोला  जा रहे हैं परन्तु खुरबानी का वास्तव में उद्देश्य क्या है? उसके क्या प्रभाव(Effects) आप पर, आप के परिवार पर और जमाने पर साफ़ साफ़ खुल जाएँ यह कोई अल्लाह का बन्दा न सोंचता है और न कहता है.

हदीस में है कि हज्ज या उम्रह करके  वापस आने वाला  मासूम बच्चे जैसा पाक हो जाता है. मासूम बच्चा सब को प्यारा होता है. लोग उसका धर्म ,रंग या ज़ात नहीं देखते.हर एक उस से प्यार करता है. इसलिए के उसके पास कोई भेदभाव नहीं होता, किसी को उससे झूट, घीबत, धोका, हसद, साजिश या फसाद कि उम्मीद नहीं होती. यदि  आप भी चाहते हैं कि लोग आप से ऐसे ही प्यार करें जैसे मासूम बच्चे से करते हैं. यदि आप चाहते हैं कि खुरबानी का गोश्त जैसे ही किसी के घर में पहूँचे लोग यह जान लें कि आज के बाद अल्लाह के हुक्म को मानने के सामने यदि औलाद भी रूकावट बने तो आप औलाद को भी इसी तरह खुर्बान कर सकते हैं. यदि आप वास्तव में यह इरादा रखते हैं कि हर प्रकार के बुत को तोड़ देंगे तो खुदा की खसम बार बार उम्र और हज्ज कीजिए, आप के उम्रे  और हज से सब को प्रेरणा (Inspiration) मिलेगी. नहीं तो यदि हज और उम्रे का उदेश्ये समझे बिना अल्लाह ताला के पास चालू खाते में कुछ  पाप कम करने और कुछ नेकियाँ  डिपाजिट करने  की निय्यत से आते रहे और समाज कि पूरी प्रणाली वही औरतों  के हाथों में रहे और आप बाहर तो बड़े नेक और पारसा बने रहें  परन्तु आप कि खुशिओं,और घमों के अवसर पर , विवाह के कामों , बच्चों कि परवरिश , जमा पूँजी वह खर्च वघैरा सब कुछ औरतों के हाथों में रहे और समाज के सारे  मरदों  की तरह बीविओं के घुलाम रहें.जोड़े , दहेज़ कि लानत हिन्दू घरों कि तरह आप के घर में भी आती रहे , दो दो चार चार बेटों के माता पिता शान से दो दो चार चार उम्रे करते रहें और बेटिओं के बाप उधार चुकाते चुकाते उमर ख़तम कर लें . न घर बदले और न राजनीती बदले , न समाज बदले, न घुरबत बदले . तो खुदा के लिए सोंचिए सी एन एन , बी बी सी वघैरा पर करोड़ों ग़ैर मुस्लिम  मक्का और मदीना में शब् खादर(27th Ramadan) और हज्ज के लाखों लोगों कि भीड़ को देख कर क्या सोंचते होंगे . येही न कि हिन्दू गणपति पर पैसा लुटाते हैं और आप मजारों पर या मक्का और मदीना की यात्रा पर .आप के पास सवाब का सिधांत है तो उन के पास पुन्न का . चमत्कार और करामात की कहानियां आप भी सुनते हैं और वह भी. काशी और अमरनाथ जाकर या गंगा जल में नहा कर उन्हें भी उतना ही संतोष होता है जितना आप को ज़म-ज़म से वजू करके.  
सवाल यह है की एक मोमिन और मुशरिक की इबादत में फ़रख कहाँ है. जिस इबादत से ज़िन्दगी का चाल चलन नहीं बदल्ता , घर, परिवार और मोहल्ले में जिस इबादत से एक अख्लाखी इनखेलाब नहीं आता उस इबादत में सिर्फ माल , समय और शक्ति का बेजा इस्तेमाल होता है. जिस इबादत को सिर्फ अपनी पसंद की इबादत करने के संतोष के  सिवा और कुछ नहीं मिलता व एक मुशरिक की इबादत तो हो सकती है मोमिन की नहीं. इस्लाम की कोई इबादत ऐसी नहीं जिस से इन्सान  के अपने जीवन में , घर में और परिवार में एक इनखेलाब न आता हो.  और हज्ज और उम्र तो बहुत बड़ी इबादत हैं, इसके सही लाभ अगर 50% भी खुल कर सामने अiजiएं तो अंधे देखने लगें और बहरे सुननें लगें . लोगो! याद रखो की एक हदीस का मतलब यह है की एक हाजी वह  होता है जो अहराम बांध कर अभी सवारी  पर पाँव ही रखता है की उसकी “लब्बैक” की आवाज़ के साथ ही फ़रिश्ते पुकार उठते हैं की मुबारक हो तुझे  तेरा हज्ज खुबूल कर लिया गया. एक हाजी वह होता है जो पूरा हज्ज कर लेता है, अपने आप को थकाता है,माल खर्च करता है,परन्तु फ़रिश्ते उसपर अफ़सोस करते हैं और कहते हैं की तेरा हज्ज तेरे मूंह पर मार दिया गया इसलिए कि तेरा माल हराम, तेरी कमाई, तेरा खाना, तेरा कपडा सब हराम से मिला हुआ था. जिन घरों में जोड़े , दहेज़ का हराम माल जमा  हो, जिस घर में सूद और रिश्वत का माल जमा हो जब तक की बहुत मजबूरी न हो, सूद पर घर, गाडी और दूसरी चीज़ें जमा की गई हों , जिस कमाई के लिए झूट बोलना जाएज़ कर लिया गया हो, जिन घरों में माल का इस्राफ करने के लिए ऐसे ऐसे काम  इजाद कर लिए गए हों जिन को न अल्लाह के रसूल (صلي الله عليه وسلم) ने पसंद किया और न सहाबा (رضوان الله عنهم أجمعين) ने. ऐसे घरों के लोग जब हज्ज पर हज्ज और उम्रे पर उम्रे करते हैं तो न सिर्फ यह की अल्लाह के घर की पाकी खराब होती है बल्कि इस्लाम की बड़ी इबादतें दुनिया वालों के लिए मजाख बन जाती हैं.

मेरे प्यारो, आओ हज्ज करने अल्लाह के घर की तरफ, उम्रे के लिए, और मदीने की ज्यारतों के लिए. बार बार आओ. परन्तु अपनी पसंद की इबादत को पूरा करने के लिए नहीं बल्कि उस बडे  उदेश्य  को अपने जीवन का उदेश्य  बनाने  के ठोस इरादे  के साथ आओ, जिस के लिए अल्लाह ताला ने इन इबादतों का हुक्म दिया है. मदीने वाले पर अपनी जान और माल लुटा देने  के दावे करने वालो आओ, और मदीने वाले के एक एक फरमान को पूरा करने के लिए अपनी जान लुटा देने की खसम खाने के लिए आओ. उनका फरमान है की मुसलमान सब कुछ हो सकता,  झूठा नहीं हो सकता. उनका फरमान है की दूसरों के लिए वही पसंद करो जो अपने लिए करते हो. उनका फरमान है की सच्चा व्यापारी खयामत के दिन नाबिओं के साथ उठाया जायेगा. उनका फरमान है कि जिस आदमी की कमाई में एक निवाला भी हराम की कमाई का मिल जाये उसकी दुआएं जमीन से एक हाथ भी ऊँची नहीं उठाई जाएगी. उनका फरमान है कि जो बन्दा दूसरों कि किदमत के कामों में लग जाता है, उसके कामों में फ़रिश्ते लग जातें है. यदि मदीने वाले से प्रेम का दावा है तो उनके फरमानों को अपने जीवन का उदेश्य बनाने कि कसम खाने एक बार आजाओ , फिर देखो कि ज़माने भर में इनखेलाब कैसे आता है. इंशाल्लाह ऐसा इनखेलाब आएगा  कि जब आप हज्ज या उम्रे से वापस लौट कर जाओगे तो आप का वजूद एक मुकम्मिल दावत बन जायेगा. जिस के नतीजे में करोड़ों हिन्दू भाई ईसाई भाई और तमाम कई धरमों के मानने वाले उम्र या हज्ज करने की तमन्ना करने लगेंगे .इंशाल्लाह. यदि इस उदेश्य के बिना आना चाहते हो तो याद रखो, यह सिर्फ एक धार्मिक पिकनिक के सिवा कुछ नहीं. इससे कहीं अच्छा है कि समाज कि भलाई के कामों में यह पैसा लगा दो ताकि दुसरे इन्सानों के जीवन को लाभ हो और उनकी दुआएं आप की आखिरत के लिए काम आएं.  
अल्लाह ताला हम सब को यह सब समझने और उस पर अमल करने कि तौफीख दे (आमीन).
कुंद हो कर रह गयी मोमिन की तैग़ ऐ बे-नियाम
है तवाफ़ व हज्ज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्या

 
आप  कि भलाई चाहने  वाला
अलीम ख़ान फ़लकी, (जेद्दाह)
aleemfalki@yahoo.com
admin@socioreforms.com

अनुवादक: Syed Mushtaq Ahmed (ahmedsm77@gmail.com)

अल्लाह लिखने वाले और तर्जुमा करने वाले की ग़लतिओं को माफ़ फरमाए . (आमीन).

1 comment

  1. praintern says:

    हाँ, सही ढंग से .

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